Thursday, 17 July 2025

लोकशाहीर अण्णाभाऊ साठे

 आज का दिन, यानी 18 जुलाई, 2025, महाराष्ट्र के माटी के लाल, लोकशाहीर अण्णाभाऊ साठे को याद करने का एक खास मौका है. यूँ तो हर दिन उनका नाम हमारे दिलों में गूँजता है, पर आज के दिन उनके जीवन और विचारों पर फिर से गौर करना बहुत जरूरी है.

अपनी पूरी ज़िंदगी अण्णाभाऊ ने, जिन्हें हम प्यार से 'अण्णा' कहते हैं, मेहनत-मजदूरी करने वाले, गाँव-देहात के गरीबों और शोषितों के लिए आवाज़ उठाई. उनका जन्म 1 अगस्त, 1920 को सांगली जिले के वाटेगाँव में हुआ था. सोचिए ज़रा, उस वक़्त क्या हालात रहे होंगे? दलितों और पिछड़ों को कैसी ज़िंदगी जीनी पड़ती थी. अण्णाभाऊ ने गरीबी और भेदभाव को बचपन से ही झेला था. स्कूल-कॉलेज जाने का मौका नहीं मिला, पर पढ़ाई की धुन इतनी थी कि खुद ही सीख लिया. किताबों से दोस्ती की और दुनिया को अपनी कलम से आईना दिखाया.

उन्होंने मुंबई की झुग्गियों में रहकर, चॉल की ज़िंदगी जीकर, मजदूरों के पसीने और उनके संघर्ष को बहुत करीब से देखा. वो सिर्फ देखते नहीं थे, बल्कि उस दर्द को अपनी कहानियों और लावनियों में ढाल देते थे. उनकी कहानियाँ पढ़कर या उनके गीत सुनकर ऐसा लगता था, मानो वो हमारी ही बात कर रहे हों, हमारे ही दुःख-सुख बाँट रहे हों. उन्होंने लोकनाट्य, पोवाड़े और लावनी के ज़रिये समाज को जगाने का काम किया. 'फकीरा' और 'चित्रा' जैसी उनकी कहानियों ने लोगों के दिलों में उतरकर एक नई चेतना जगाई.

अण्णाभाऊ सिर्फ एक लेखक नहीं थे, वो एक विचारक, समाज सुधारक और क्रांतिकारी भी थे. डॉ. बाबासाहेब अंबेडकर और कार्ल मार्क्स के विचारों का उन पर गहरा प्रभाव था. उन्होंने समानता और न्याय के लिए जीवन भर संघर्ष किया. ग़रीबी, अशिक्षा और सामाजिक भेदभाव के खिलाफ उनकी कलम एक तलवार की तरह चलती थी.

उनकी ज़िंदगी हमें ये सिखाती है कि चाहे हालात कितने भी मुश्किल क्यों न हों, अगर मन में दृढ़ता हो तो हम हर मुश्किल को पार कर सकते हैं. अण्णाभाऊ ने कभी हार नहीं मानी. वो अपनी कला के ज़रिये समाज को बदलने का सपना देखते रहे और उसके लिए आखिरी साँस तक लड़ते रहे.

आज, यानी 18 जुलाई, 2025, जब हम उनके विचारों को याद कर रहे हैं, तो हमें सोचना चाहिए कि क्या हम उनके दिखाए रास्ते पर चल रहे हैं? क्या आज भी हमारे समाज में वो भेदभाव मौजूद है जिसके खिलाफ अण्णाभाऊ ने आवाज़ उठाई थी? उनकी स्मृति में, हम सभी को यह प्रण लेना चाहिए कि हम उनके सपनों के भारत को बनाने में अपना योगदान देंगे, जहाँ कोई गरीब न हो, कोई शोषित न हो, और हर इंसान को बराबरी का सम्मान मिले.

Monday, 7 July 2025

अधिकारों की गूंज: बाबासाहेब द्वारा स्थापित बहिष्कृत हितकारिणी सभा की दास्तान

 हमारे भारत देश में, जहाँ सदियों से कुछ लोगों को समाज से अलग-थलग रखा गया था, जहाँ उनके साए से भी लोग परहेज़ करते थे, वहीं से एक आवाज़ उठी। ये आवाज़ थी बाबासाहेब डॉ. बी.आर. अंबेडकर की, जिन्होंने दलितों, शोषितों और वंचितों के दर्द को सिर्फ महसूस ही नहीं किया, बल्कि उसे बदलने का बीड़ा भी उठाया। इसी सोच का नतीजा था बहिष्कृत हितकारिणी सभा, जिसकी नींव 20 जुलाई, 1924 को रखी गई थी। ये कोई मामूली संस्था नहीं थी, ये तो एक क्रांति का आगाज़ था, उन हज़ारों-लाखों बेज़ुबानों की आवाज़ बनने का एक पवित्र प्रयास।

इस सभा के पीछे का दर्द और गहरा इतिहास छुपा है। उस दौर में अछूत कहे जाने वाले लोगों को गाँवों से बाहर रहना पड़ता था, कुओं से पानी नहीं पीने दिया जाता था, मंदिरों में प्रवेश वर्जित था और उन्हें शिक्षा का अधिकार भी नहीं था। उनके साथ जानवरों से भी बदतर सलूक होता था। बाबासाहेब ने अपनी आँखों से ये सब देखा था, खुद झेला था। जब वे विदेश से पढ़कर लौटे, तो उन्होंने महसूस किया कि सिर्फ किताबें पढ़ लेने से या डिग्री हासिल कर लेने से समाज की ये कड़वी सच्चाई नहीं बदलेगी। उन्होंने तय किया कि इन लोगों को उनके अधिकार दिलाने के लिए एक संगठित प्रयास की ज़रूरत है। उनके मन में यह विचार एक बीज की तरह पनपा, जिसे उन्होंने अपने संघर्षों और अनुभवों से सींचा। उन्होंने देखा कि बिखरे हुए प्रयासों से कुछ नहीं होगा, एक मज़बूत नींव चाहिए जहाँ से आवाज़ उठाई जा सके और समाज में बदलाव की बयार लाई जा सके।

बहिष्कृत हितकारिणी सभा का मुख्य उद्देश्य था 'पढ़ो, संगठित हो, संघर्ष करो' (Educate, Agitate, Organize)। इसका सीधा सा मतलब था कि सबसे पहले दलितों को शिक्षित करना है, क्योंकि शिक्षा ही हर मुक्ति का द्वार है। इसके लिए उन्होंने स्कूल खोले, छात्रावास बनाए ताकि बच्चे पढ़ सकें। 1924 में इसकी स्थापना के साथ ही, सभा ने ज़मीन पर काम करना शुरू कर दिया। उन्होंने गाँवों-गाँवों में जाकर लोगों को उनके अधिकारों के बारे में बताया, उन्हें समझाया कि वे भी इंसान हैं और उन्हें भी गरिमा के साथ जीने का पूरा हक है। 3 अप्रैल, 1927 को उन्होंने 'बहिष्कृत भारत' नामक एक पाक्षिक पत्रिका भी शुरू की, जिसके ज़रिए वे अपने विचारों और समाज की सच्चाई को लोगों तक पहुँचाते थे। ये पत्रिका सिर्फ खबरें नहीं थी, ये तो हर उस व्यक्ति की आवाज़ थी जिसे अब तक चुप कराया गया था। 1927 का महाड सत्याग्रह इसी सभा के प्रयासों का एक महत्वपूर्ण हिस्सा था, जब दलितों को सार्वजनिक तालाब से पानी पीने के अधिकार के लिए संघर्ष किया गया। ये सिर्फ पानी पीने का नहीं, आत्मसम्मान का संघर्ष था, जिसने पूरे देश में हलचल मचा दी थी।

इस सभा ने कई महत्वपूर्ण काम किए। शिक्षा के प्रचार-प्रसार से लेकर सामाजिक समानता के लिए आंदोलनों तक, बहिष्कृत हितकारिणी सभा ने दलितों के उत्थान के लिए अथक प्रयास किए। उन्होंने सरकारी नौकरियों में आरक्षण, मंदिरों में प्रवेश और अंतरजातीय विवाह जैसे मुद्दों पर भी आवाज़ उठाई। यह सभा दलितों के लिए एक आशा की किरण थी, एक ऐसा मंच जहाँ वे अपनी पीड़ा को व्यक्त कर सकते थे और अपने हक के लिए लड़ सकते थे। बाबासाहेब जानते थे कि सिर्फ आंदोलन से बात नहीं बनेगी, जब तक कि उनके लोगों को ज्ञान का प्रकाश न मिले। इसलिए, शिक्षा पर उनका विशेष ज़ोर था।

समय के साथ, परिस्थितियों में बदलाव आए और आंदोलन ने नए रूप लिए। बहिष्कृत हितकारिणी सभा ने अपना काम बखूबी किया और एक मज़बूत नींव रखी। जब 1930 में बाबासाहेब ने राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाने का फैसला किया और गोलमेज़ सम्मेलनों में हिस्सा लेने लगे, तो आंदोलन को एक नया आयाम मिला। बाद में, 1935 में, उन्होंने 'इंडिपेंडेंट लेबर पार्टी' का गठन किया, जिसका उद्देश्य दलितों और श्रमिकों के राजनीतिक अधिकारों के लिए संघर्ष करना था। इस तरह, बहिष्कृत हितकारिणी सभा का प्रत्यक्ष कार्य समाप्त हो गया, लेकिन उसके द्वारा बोए गए बीज कभी नहीं मुरझाए। उसके सिद्धांतों और आदर्शों ने आगे चलकर दलित आंदोलन को और भी सशक्त बनाया। यह सभा भले ही आज उस रूप में मौजूद न हो, लेकिन उसका प्रभाव आज भी हमारे समाज में स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। वह उन लाखों दिलों में ज़िंदा है, जिन्हें उसने उम्मीद की रौशनी दिखाई थी, उन्हें जीने की एक नई वजह दी थी। ये सिर्फ एक सभा नहीं थी, ये एक युग का परिवर्तन था।

https://www.facebook.com/share/19nzN6DrUr/

अगर जानकारी अच्छी लगी हो तो पोस्ट के साथ फेसबुक पेज को भी लाइक करें ताकि हमें और भी प्रेरणा मिल सके।

Friday, 4 July 2025

"हिन्दू कोड बिल: हर महिला के लिए जानना ज़रूरी है"

 ये कहानी है आंबेडकर की... और हिन्दू कोड बिल की। एक ऐसा सपना, जो अधूरा रह गया… काश पूरा हो जाता।

तुमने कभी सोचा है कि आज अगर महिलाओं को थोड़ा बहुत हक़ मिला है, तो उसकी नींव किसने रखी थी? वो कोई और नहीं, बाबा साहेब आंबेडकर थे। उन्होंने सिर्फ दलितों के लिए नहीं, बल्कि पूरे हिन्दू समाज—खासतौर पर महिलाओं के लिए—एक ऐसा कानून लाने की कोशिश की थी, जो इतिहास में पहली बार उन्हें बराबरी का हक़ देता।

ये बात है आज़ादी के बाद की, जब देश नया-नया बना था। तब आंबेडकर भारत के पहले कानून मंत्री थे। उन्होंने देखा कि हिन्दू समाज में महिलाएं सिर्फ बोझ बनकर रह गई हैं—ना उन्हें पैतृक संपत्ति में हिस्सा मिलता था, ना अपने जीवन के फैसले खुद लेने का अधिकार। शादी, तलाक, गोद लेने का अधिकार—सब कुछ पुरुष प्रधान था।

बाबा साहेब ने सोचा कि जब देश आज़ाद हो गया है, तो महिलाओं को भी आज़ादी क्यों न मिले? उन्होंने ‘हिन्दू कोड बिल’ का मसौदा तैयार किया। इसका मकसद था हिन्दू महिलाओं को पुरुषों के बराबर अधिकार देना।

लेकिन अफ़सोस… समाज इसके लिए तैयार नहीं था

जब ये बिल संसद में आया, तो तूफान मच गया। देश की बड़ी-बड़ी जात-पात वाली शक्तियाँ, धर्म के ठेकेदार, परंपराओं के नाम पर इसके विरोध में उतर आए। कहा गया कि "ये तो हिन्दू धर्म पर हमला है", "आंबेडकर हमारी संस्कृति को मिटा रहे हैं।"

तुम सोचो ज़रा—एक आदमी, जो संविधान बना चुका था, जिसने देश को कानून की ज़ुबान सिखाई, उसे ही अपने ही देश में अपमान झेलना पड़ा।

1951 में ये बिल संसद में रखा गया, लेकिन विरोध इतना ज़्यादा हुआ कि इसे पास ही नहीं होने दिया गया। अंततः आंबेडकर को मजबूरी में 14 अक्टूबर 1951 को कानून मंत्री के पद से इस्तीफा देना पड़ा।

सोचो, कितना दुखी हुआ होगा वो इंसान, जिसने अपना सारा जीवन इंसाफ़ और बराबरी के लिए झोंक दिया। वो कहते थे — “मैं उस धर्म को मानने को तैयार नहीं, जो इंसान को इंसान का दर्जा न दे।”

अगर हिन्दू कोड बिल उस वक्त पास हो जाता, तो भारत की लाखों-करोड़ों महिलाएं आज से 70 साल पहले ही बराबरी का हक़ पातीं। समाज की बुनियाद ही बदल जाती। तलाक, संपत्ति, गोद लेने जैसे मामलों में महिलाएं पुरुषों की मोहताज न रहतीं। शायद आज हम और आगे होते।

लेकिन सच तो ये है कि बदलाव की राह कभी आसान नहीं होती।

बाद में पंडित नेहरू ने 1955-56 में इस बिल को टुकड़ों में बाँटकर अलग-अलग कानूनों के रूप में पास कराया — जैसे कि Hindu Marriage Act, Hindu Succession Act, आदि। मगर आंबेडकर जो एकीकृत और सम्पूर्ण बदलाव लाना चाहते थे, वो अधूरा रह गया।

आज जब हम महिलाओं के अधिकार की बात करते हैं, तो हमें याद रखना चाहिए कि इस क्रांति की शुरुआत सबसे पहले बाबा साहेब ने की थी।

वो सिर्फ संविधान निर्माता नहीं थे, वो एक सपनों के सौदागर थे—ऐसे सपने जो हर इंसान को बराबरी की जगह दिलाते हैं।

तो अगली बार जब तुम किसी महिला को अपने अधिकार के लिए लड़ते देखो, तो याद रखना—उस लड़ाई की शुरुआत उस दिन हुई थी, जब आंबेडकर ने हिन्दू कोड बिल संसद में रखा था।


अस्पृश्यता और Article 17:Indian Constitution

भारत के संविधान में जो कुछ बातें दिल को छूती हैं, उनमें से एक सबसे बड़ी बात है अनुच्छेद 17, जो छुआछूत को जड़ से मिटाने की कसम खाता है। लेकिन इस अनुच्छेद की नींव सिर्फ कागज और क़लम से नहीं बनी, यह बनी थी उस दर्द से, जो पीढ़ियों तक कुछ लोगों को इंसान होने का हक़ भी नहीं देता था। और इस बदलाव की सबसे बड़ी मशाल जलाने वाले थे डॉ. भीमराव अंबेडकर, जिन्हें आज भी गाँव-गाँव में लोग "बाबा साहेब" कहकर आदर देते हैं।

बाबा साहेब खुद उसी पीड़ा से गुज़रे थे, जिसे वो मिटाना चाहते थे। उनका बचपन, स्कूल में किनारे बैठकर पढ़ना, पानी पीने के लिए दूसरों की मदद मांगना, और फिर भी दिल में यह ठान लेना कि “अगर समाज बदलना है, तो कानून से ही बदलेगा”—यही सोच थी अनुच्छेद 17 के पीछे। उन्होंने न सिर्फ संविधान लिखा, बल्कि समाज के सबसे दबे-कुचले लोगों की आवाज़ भी बने।

26 नवंबर 1949 को जब संविधान सभा ने संविधान को अपनाया, उसमें अनुच्छेद 17 को भी स्वीकृति दी गई। और फिर जब 26 जनवरी 1950 को संविधान लागू हुआ, तब से यह कानून देश के हर कोने में लागू हो गया। इस अनुच्छेद में साफ़ लिखा है कि "अस्पृश्यता का अंत होगा और उसका किसी भी रूप में प्रचार या अभ्यास कानूनन अपराध माना जाएगा।"

यह एक छोटा सा अनुच्छेद था, पर इसकी गूंज बहुत बड़ी थी। यह सिर्फ एक सामाजिक सुधार नहीं था, यह आत्मसम्मान की वापसी थी। इससे पहले जात-पात की बेड़ियाँ इतनी कसी थीं कि लोगों को न स्कूल में जगह मिलती थी, न मंदिर में, न कुएं से पानी भरने की इजाज़त। समाज उन्हें छूने से अपवित्र हो जाता था। बाबा साहेब ने इसे "मानवता के माथे पर कलंक" कहा था, और इसे मिटाना उनका जीवन का मक़सद बन गया।

गाँवों में, जहाँ ये छुआछूत की जड़ें सबसे गहरी थीं, वहाँ अनुच्छेद 17 एक आशा की किरण बनकर पहुँचा। अब कोई भी जात के आधार पर न दबाया जा सकता है, न अपमानित किया जा सकता है। अगर कोई ऐसा करता है, तो उसे कानून के तहत सज़ा मिल सकती है। ये सिर्फ कागज़ी कानून नहीं है, ये हर उस इंसान की लड़ाई है, जो सम्मान से जीना चाहता है।

बाबा साहेब ने कहा था कि "मैं उस धर्म को नहीं मानता जो इंसान और इंसान में भेद करे।" और इसी सोच से निकला ये अनुच्छेद, जो बताता है कि इंसानियत सबसे बड़ा धर्म है।

आज भी अगर किसी गाँव में कोई बच्चा पहली बार स्कूल में सबके साथ बैठता है, या कोई दलित बहन मंदिर में पूजा करती है, तो समझो कि अनुच्छेद 17 का असर ज़िंदा है। ये कानून हर उस आँसू की मरहम है, जो सदियों से दबा था।

लेकिन काम अभी भी बाकी है। कानून बन चुका है, पर उसे दिलों में उतरना बाकी है। और ये काम हम सबका है। जब तक समाज में बराबरी नहीं होगी, तब तक संविधान की आत्मा अधूरी है।

अगर ये लेख आपके दिल को छू गया हो, अगर आपको भी लगता है कि बाबा साहेब का सपना अब भी अधूरा है और हम सब मिलकर उसे पूरा कर सकते हैं—तो इसे लाइक करें, शेयर करें और फॉलो करना न भूलें। क्योंकि बदलाव की आवाज़ वहीं पहुँचती है, जहाँ दिल से दिल जुड़ते हैं।


Thursday, 3 July 2025

डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर यांना "घटनांचे शिल्पकार" का म्हटलं जातं

 भारतीय लोकशाही आज ज्या आधारावर उभी आहे, ती जर कोणाचं श्रेय असेल, तर ते डॉ. बाबासाहेब आंबेडकरांचं आहे. बाबासाहेब म्हणजे फक्त एक कायदेपंडित नव्हते, तर ते लाखो कोट्यवधींच्या आशा-आकांक्षांचा आवाज होते. त्यांनी केवळ संविधान लिहिलं नाही, तर ते भारताच्या आत्म्याला आकार देणारे होते. म्हणूनच त्यांना “घटनांचे शिल्पकार” म्हटलं जातं आणि ते फक्त एक उपमा नाही, तर तो त्यांच्या अथक परिश्रमांचा आणि दूरदृष्टीचा सन्मान आहे.



आपण स्वातंत्र्याच्या उंबरठ्यावर असताना देशाची दिशा आणि चालणं निश्चित करणं ही खूप मोठी जबाबदारी होती. १९४६ साली जेव्हा संविधानसभा स्थापन झाली, तेव्हा त्या सभेमध्ये २९९ सदस्य होते. ही सभा ९ डिसेंबर १९४६ रोजी पहिल्यांदा बसली आणि तेव्हा कुणालाही कल्पना नव्हती की पुढच्या तीन वर्षांत आपलं भविष्य कोणत्या शब्दांत लिहिलं जाईल. त्याच दिवशी पंडित जवाहरलाल नेहरू यांनी उद्दिष्ट ठराव मांडला आणि स्पष्ट केलं की भारत हा धर्मनिरपेक्ष, लोकशाही आणि सार्वभौम देश असेल. या उद्दिष्टाचा पाया घालायचा काम बाबासाहेब आंबेडकरांकडे दिलं गेलं आणि त्यांनी ती जबाबदारी स्वीकारलीदेखील, पण केवळ एक पद म्हणून नाही, तर एक मिशन म्हणून.

२९ ऑगस्ट १९४७ रोजी संविधान तयार करण्यासाठी मसुदा समिती म्हणजेच ड्राफ्टिंग कमिटी स्थापन करण्यात आली. त्यात सात सदस्य होते – डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर अध्यक्ष होते, सोबत अल्लादी कृष्णस्वामी अय्यर, एन. गोपालस्वामी आययंगार, कन्हैयालाल मुंशी, बी. एल. मित्तर, सायेद मोहम्मद सादुल्ला आणि डी. पी. खेतान होते. नंतर काही बदल झाले – बी. एल. मित्तर यांनी राजीनामा दिला, डी. पी. खेतान यांचं निधन झालं, त्याऐवजी एन. माधव राव आले. या सगळ्या प्रक्रियेत लोकांनी आपले वैयक्तिक स्वार्थ बाजूला ठेवून देशासाठी काम केलं.

पण यामध्ये सगळ्यात महत्त्वाचं काम बाबासाहेबांचं होतं. त्यांचं मन त्या प्रत्येक गरीब, दलित, शोषित, स्त्री, अल्पसंख्याक व्यक्तीच्या भावनांनी भरलेलं होतं ज्यांना हजारो वर्षं अन्याय सहन करावा लागला होता. त्यांना माहीत होतं की जर हे संविधान सगळ्यांना समान न्याय देणारं नसेल, तर लोकशाहीचं स्वप्न अपूर्ण राहील. म्हणून त्यांनी कायद्याच्या प्रत्येक शब्दामध्ये समतेचा आत्मा भरला. त्यांनी शिक्षणाचा अधिकार दिला, अस्पृश्यता कायदेशीररित्या नष्ट केली, जातीपातीला विरोध केला, स्त्रियांना समानतेचा दर्जा दिला, आणि समाजातील मागास वर्गासाठी आरक्षण दिलं.

या प्रक्रियेसाठी बाबासाहेबांनी जगभरातल्या संविधानांचा अभ्यास केला – अमेरिकेचं, इंग्लंडचं, आयर्लंडचं, फ्रान्सचं – आणि त्यातून भारतासाठी साजेसं संविधान तयार केलं. अनेकदा ते रात्री उशिरापर्यंत काम करत, हजारो पानं चाळत, एकेक कलम पिंजून बघत, कधी विचार करत की “या शब्दाचा सामान्य माणसावर काय परिणाम होईल?” ते केवळ कायदेकारक नव्हते, तर जनतेचे मन वाचणारे विचारवंत होते. त्यांनी संविधानात फक्त कायद्याचे नियम दिले नाहीत, तर एक माणूस म्हणून जगण्याचा आत्मसन्मान दिला.



२६ नोव्हेंबर १९४९ रोजी संविधान स्वीकारण्यात आलं आणि २६ जानेवारी १९५० पासून ते अंमलात आलं. हा दिवस फक्त एक कायदा लागू होण्याचा नव्हता, तर कोट्यवधी लोकांना नवी ओळख मिळाल्याचा दिवस होता – मी एक भारतीय आहे, आणि मला हक्क आहेत, हे सांगणारा दिवस.

संविधानाच्या प्रत्येक ओळीच्या मागे जे विचार, जे मूलभूत मूल्यं आणि जे संघर्ष दिसतात, ते बाबासाहेबांचे होते. म्हणूनच त्यांना घटनांचे शिल्पकार म्हटलं जातं – ते कोणत्याही राजकीय पक्षाच्या मर्यादेपलीकडचं नाव आहे, ते एक आदराचं प्रतीक आहे.

आज आपण जेव्हा मतदान करत असतो, बोलण्याचं स्वातंत्र्य घेतो, शिक्षण घेतो, आरक्षणाचा लाभ घेतो, तेव्हा लक्षात घ्या – ही सगळी बाबासाहेबांनी दिलेली शिदोरी आहे. तेव्हा केवळ कायदा लिहून दिला नव्हता, तर "मी ही या देशाचा समान नागरिक आहे" हे आत्मविश्वासाने सांगण्याची ताकद दिली होती. आणि म्हणून, त्यांचं कार्य विसरणं म्हणजे स्वतःच्या हक्कांवरच पाणी फेरणं होईल. त्यांचं स्वप्न अजूनही पूर्ण व्हायचं आहे – एक असा भारत जिथं कोणालाही जाती, धर्म, वर्ग यांच्या आधारावर कमीपणा वाटू नये. त्या दिशेने पाऊल टाकणं हीच खरी बाबासाहेबांना खरी श्रद्धांजली ठरेल.

Wednesday, 2 July 2025

14 अक्तूबर की सुबह: आत्मसम्मान की नई शुरुआत

 

कभी-कभी एक सुबह सिर्फ सुबह नहीं होती, वो एक नई सोच, नया जोश और ज़िन्दगी की दिशा बदल देने वाला पल बन जाती है। 14 अक्तूबर की सुबह भी कुछ ऐसी ही थी। ये वो दिन था, जब इंसान ने इंसानियत को फिर से पहचाना, और अपने आत्मसम्मान की लौ को फिर से जलाया।

ये बात सिर्फ किताबों की नहीं है, ये बात उस हर इंसान के दिल की है, जो कभी समाज में छोटा समझा गया, जिसे हक नहीं मिला, इज़्ज़त नहीं मिली। लेकिन उस सुबह जब बाबा साहब डॉ. भीमराव अंबेडकर ने बौद्ध धर्म अपनाया, तो उन्होंने सिर्फ अपना रास्ता नहीं बदला, बल्कि लाखों लोगों को एक नई दिशा दी।

इस दिन नागपुर की धरती पर जो हुआ, वो एक इतिहास नहीं, इंकलाब था। बाबा साहब ने कहा था, "मैं हिन्दू पैदा हुआ, लेकिन हिन्दू रहूँगा नहीं।" ये शब्द नहीं थे, ये उस दर्द की आग थी जो उन्होंने ताउम्र सहा। और उस आग ने 14 अक्तूबर को एक नया सवेरा बना दिया।



लोगों ने नए कपड़े नहीं पहने थे, ना ही कोई बड़ी सजावट थी। लेकिन आंखों में जो चमक थी, वो आज भी तस्वीरों में ज़िंदा है। वो चमक थी पहली बार इंसान समझे जाने की। पहली बार किसी ने सिर झुका कर नहीं, सीना तान कर अपने धर्म को अपनाया।

आज भी जब कोई बच्चा स्कूल जाता है, कोई लड़की अपने अधिकार के लिए खड़ी होती है, कोई बुजुर्ग अपने अनुभवों में 14 अक्तूबर की बात करता है, तो लगता है जैसे वो सुबह फिर से लौट आई हो। क्योंकि ये सुबह सिर्फ एक दिन नहीं, एक सोच है। वो सोच जो कहती है कि "मैं भी बराबर हूँ, मुझे भी जीने का हक है।"

आज भी बहुत से लोग ऐसे हैं जो जात-पात के जाल में फंसे हुए हैं। जो खुद को छोटा समझते हैं क्योंकि समाज ने उन्हें ऐसा महसूस कराया। लेकिन उन्हें ये जानना ज़रूरी है कि बाबा साहब ने जो चिंगारी 14 अक्तूबर को जगाई थी, वो आज भी जल रही है। बस जरूरत है उस आग को अपने अंदर महसूस करने की।


अगर आप इस लेख को पढ़ रहे हैं, तो रुकिए एक पल और सोचिए—क्या आपने अपने आत्मसम्मान के लिए आज तक कोई फैसला लिया है? क्या आपने कभी खुद से कहा है कि "14 अक्तूबर की सुबह: आत्मसम्मान की नई शुरुआत और नहीं, अब मैं खुद को छोटा नहीं मानूंगा?" अगर नहीं कहा, तो आज कहिए। अभी कहिए।

14 अक्तूबर की सुबह हमें यही सिखाती है कि बदलाव तभी आता है, जब हम खुद को बदलने का हौसला रखते हैं। ये हौसला बाबा साहब ने दिया, और अब ये जिम्मेदारी हमारी है कि हम उसे ज़िंदा रखें।

इस लेख को पढ़कर अगर आपकी आंखों में थोड़ा भी पानी आया हो, दिल में थोड़ा भी जोश जागा हो, तो इसे अपने दोस्तों और परिवार के साथ ज़रूर साझा करें। क्योंकि ये सिर्फ जानकारी नहीं, जागृति है।


Friday, 27 June 2025

🌾 ‘सकपाल’ से ‘आंबेडकर’ बनने की यात्रा: बाबासाहेब की पहचान की कहानी

 जब हम डॉ. भीमराव आंबेडकर का नाम लेते हैं, तो हमारे ज़हन में एक महान चिंतक, संविधान निर्माता और सामाजिक क्रांति के अग्रदूत की तस्वीर उभरती है। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि इस नाम के पीछे भी एक संघर्ष की कहानी छुपी है। ये सिर्फ नाम बदलने की बात नहीं थी, ये एक ऐसे इंसान की पहचान और आत्म-सम्मान की कहानी थी, जिसने अपना नाम खुद चुना — और उस नाम को इतिहास के पन्नों पर अमर कर दिया।

🌱 जन्म और शुरुआती पहचान – भीमराव सकपाल

14 अप्रैल 1891 को, ब्रिटिश भारत के महू नामक सैन्य छावनी क्षेत्र (जो अब मध्य प्रदेश में है) में एक बच्चा पैदा हुआ। उसका नाम रखा गया — भीमराव, पिता का नाम था रामजी मालोजी सकपाल। परिवार महाराष्ट्र के रत्नागिरी जिले के ‘अंबावडे’ गांव से ताल्लुक रखता था, लेकिन रोज़गार के सिलसिले में वे मध्य प्रदेश आ गए थे। रामजी जी ब्रिटिश सेना में सूबेदार के पद पर थे।

बाबासाहेब एक दलित जाति, महार समुदाय से थे, जिसे उस समय ‘अछूत’ माना जाता था। उस समय की सामाजिक व्यवस्था में जाति ही व्यक्ति की पहचान बन जाती थी, और दलितों को समाज में सम्मान की दृष्टि से नहीं देखा जाता था। इसलिए, उनका उपनाम 'सकपाल' ही उनके साथ जुड़ा रहा, जो समाज की ओर से थोपे गए पहचान का प्रतीक बन गया।

🏫 शिक्षा के दौरान नाम में पहला बदलाव – भीमराव अंबावडेकर

जब भीमराव ने स्कूल में दाखिला लिया, तो वहां की व्यवस्था कुछ और ही तरह की थी। स्कूलों में नाम दर्ज करते समय उपनाम ज़रूरी था, और उपनाम जाति, गांव या काम के आधार पर दिया जाता था।

भीमराव के एक ब्राह्मण शिक्षक, जिनका नाम महादेव आंबेडकर था, ने उनकी प्रतिभा को पहचाना। उन्होंने महसूस किया कि ‘सकपाल’ जैसे उपनाम के चलते समाज और स्कूल में भीमराव को तुच्छ समझा जा सकता है। शिक्षक चाहते थे कि ये होशियार लड़का किसी हीनभावना में न जिए।

उन्होंने उसके नाम में थोड़ा बदलाव कर दिया और लिखा – भीमराव अंबावडेकर। ‘अंबावडे’ उनके पुश्तैनी गांव का नाम था, और महाराष्ट्र में यह आम चलन था कि लोग अपने गांव के नाम पर उपनाम रखते थे। इस तरह, ‘सकपाल’ की जगह ‘अंबावडेकर’ उपनाम ने एक नई पहचान दी, जो कि गांव से जुड़ी हुई लेकिन जाति से अलग थी।



✈️ विदेश यात्रा और पहचान की नई खोज – भीमराव अंबेडकर

बाबासाहेब की शिक्षा की उड़ान बहुत ऊँची थी। उन्हें बड़ौदा राज्य की तरफ से छात्रवृत्ति मिली और वे पढ़ाई के लिए अमेरिका की कोलंबिया यूनिवर्सिटी और बाद में लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स गए। ये उस समय किसी दलित युवक के लिए कल्पना से भी परे बात थी।

अब विदेश में पढ़ाई के लिए दस्तावेज़ों और प्रमाणपत्रों में नाम का पंजीकरण करवाना ज़रूरी था। वहां अंग्रेज़ों के लिए 'अंबावडेकर' जैसे नाम का उच्चारण कठिन था और यह नाम अब भी गांव से जुड़ी पहचान को दर्शाता था।

इसी समय, बाबासाहेब के जीवन में एक और प्रेरणास्रोत आए — कृष्णाजी केशव आंबेडकर, जो एक शिक्षित ब्राह्मण थे और बाबासाहेब को अपने पुत्र जैसा मानते थे। उन्होंने न सिर्फ उन्हें प्रेरणा दी बल्कि उन्हें 'आंबेडकर' उपनाम स्नेहपूर्वक उपहार के रूप में दे दिया। यह उपनाम छोटा, सुलभ और सामाजिक रूप से ज्यादा सम्मानजनक था।

बाबासाहेब ने इसे आत्मसात किया और फिर ज़िंदगी भर अपने नाम के आगे "आंबेडकर" ही लिखा। इस तरह वो भीमराव रामजी आंबेडकर बन गए।

🔥 नाम नहीं, यह आत्म-सम्मान की लौ थी

यह नाम बदलना कोई साधारण घटना नहीं थी। यह सिर्फ "सकपाल" से "आंबेडकर" होने की कहानी नहीं है, बल्कि यह उस समय के भारत में एक दलित बालक के भीतर उठती हुई आत्मसम्मान की आग की कहानी है। यह बदलाव उस सोच की बुनियाद थी, जो आगे चलकर जात-पात तोड़ने वाले और समानता की बात करने वाले भारत के संविधान को जन्म देने वाली थी।

‘आंबेडकर’ नाम के साथ भीमराव ने पूरे देश के दबे-कुचले वर्गों की आवाज बनकर उभरने की शुरुआत की। उनके नाम में अब कोई जाति या गांव की पहचान नहीं थी, बल्कि उसमें छुपा था — ज्ञान, संघर्ष और आत्मबल का प्रतीक।

🌻 आज के दौर में यह नाम क्या सिखाता है?

आज जब हम बाबासाहेब का नाम लेते हैं, तो वह सिर्फ एक व्यक्ति का नाम नहीं, बल्कि एक आंदोलन का प्रतीक बन चुका है। उनकी यह यात्रा यह सिखाती है कि पहचान समाज तय नहीं करता, इंसान खुद बनाता है।

उनका नाम आज लाखों लोगों के लिए प्रेरणा है, जो समझते हैं कि परिस्थितियाँ चाहे जैसी हों, लेकिन अगर आपके भीतर कुछ कर गुजरने का हौसला है, तो आप अपनी तक़दीर खुद लिख सकते हैं।

✍️ नाम का परिवर्तन, सोच की क्रांति

बाबासाहेब का नाम बदलना उस समय की सामाजिक व्यवस्था के खिलाफ एक मौन विद्रोह था। यह विद्रोह था एक ऐसे समाज के खिलाफ, जो नाम और जाति से आदमी की हैसियत तय करता था। 'सकपाल' से 'आंबेडकर' बनते हुए बाबासाहेब ने न केवल खुद को बदला, बल्कि पूरे देश की सोच बदल दी।

आज हमें यह समझने की जरूरत है कि नाम से नहीं, काम से पहचान बनती है। और जब नाम और काम दोनों मिलकर चलें, तो इतिहास बनता है — जैसा कि बाबासाहेब ने कर दिखाया।