आज का दिन, यानी 18 जुलाई, 2025, महाराष्ट्र के माटी के लाल, लोकशाहीर अण्णाभाऊ साठे को याद करने का एक खास मौका है. यूँ तो हर दिन उनका नाम हमारे दिलों में गूँजता है, पर आज के दिन उनके जीवन और विचारों पर फिर से गौर करना बहुत जरूरी है.
अपनी पूरी ज़िंदगी अण्णाभाऊ ने, जिन्हें हम प्यार से 'अण्णा' कहते हैं, मेहनत-मजदूरी करने वाले, गाँव-देहात के गरीबों और शोषितों के लिए आवाज़ उठाई. उनका जन्म 1 अगस्त, 1920 को सांगली जिले के वाटेगाँव में हुआ था. सोचिए ज़रा, उस वक़्त क्या हालात रहे होंगे? दलितों और पिछड़ों को कैसी ज़िंदगी जीनी पड़ती थी. अण्णाभाऊ ने गरीबी और भेदभाव को बचपन से ही झेला था. स्कूल-कॉलेज जाने का मौका नहीं मिला, पर पढ़ाई की धुन इतनी थी कि खुद ही सीख लिया. किताबों से दोस्ती की और दुनिया को अपनी कलम से आईना दिखाया.
उन्होंने मुंबई की झुग्गियों में रहकर, चॉल की ज़िंदगी जीकर, मजदूरों के पसीने और उनके संघर्ष को बहुत करीब से देखा. वो सिर्फ देखते नहीं थे, बल्कि उस दर्द को अपनी कहानियों और लावनियों में ढाल देते थे. उनकी कहानियाँ पढ़कर या उनके गीत सुनकर ऐसा लगता था, मानो वो हमारी ही बात कर रहे हों, हमारे ही दुःख-सुख बाँट रहे हों. उन्होंने लोकनाट्य, पोवाड़े और लावनी के ज़रिये समाज को जगाने का काम किया. 'फकीरा' और 'चित्रा' जैसी उनकी कहानियों ने लोगों के दिलों में उतरकर एक नई चेतना जगाई.
अण्णाभाऊ सिर्फ एक लेखक नहीं थे, वो एक विचारक, समाज सुधारक और क्रांतिकारी भी थे. डॉ. बाबासाहेब अंबेडकर और कार्ल मार्क्स के विचारों का उन पर गहरा प्रभाव था. उन्होंने समानता और न्याय के लिए जीवन भर संघर्ष किया. ग़रीबी, अशिक्षा और सामाजिक भेदभाव के खिलाफ उनकी कलम एक तलवार की तरह चलती थी.
उनकी ज़िंदगी हमें ये सिखाती है कि चाहे हालात कितने भी मुश्किल क्यों न हों, अगर मन में दृढ़ता हो तो हम हर मुश्किल को पार कर सकते हैं. अण्णाभाऊ ने कभी हार नहीं मानी. वो अपनी कला के ज़रिये समाज को बदलने का सपना देखते रहे और उसके लिए आखिरी साँस तक लड़ते रहे.
आज, यानी 18 जुलाई, 2025, जब हम उनके विचारों को याद कर रहे हैं, तो हमें सोचना चाहिए कि क्या हम उनके दिखाए रास्ते पर चल रहे हैं? क्या आज भी हमारे समाज में वो भेदभाव मौजूद है जिसके खिलाफ अण्णाभाऊ ने आवाज़ उठाई थी? उनकी स्मृति में, हम सभी को यह प्रण लेना चाहिए कि हम उनके सपनों के भारत को बनाने में अपना योगदान देंगे, जहाँ कोई गरीब न हो, कोई शोषित न हो, और हर इंसान को बराबरी का सम्मान मिले.
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