Monday, 7 July 2025

अधिकारों की गूंज: बाबासाहेब द्वारा स्थापित बहिष्कृत हितकारिणी सभा की दास्तान

 हमारे भारत देश में, जहाँ सदियों से कुछ लोगों को समाज से अलग-थलग रखा गया था, जहाँ उनके साए से भी लोग परहेज़ करते थे, वहीं से एक आवाज़ उठी। ये आवाज़ थी बाबासाहेब डॉ. बी.आर. अंबेडकर की, जिन्होंने दलितों, शोषितों और वंचितों के दर्द को सिर्फ महसूस ही नहीं किया, बल्कि उसे बदलने का बीड़ा भी उठाया। इसी सोच का नतीजा था बहिष्कृत हितकारिणी सभा, जिसकी नींव 20 जुलाई, 1924 को रखी गई थी। ये कोई मामूली संस्था नहीं थी, ये तो एक क्रांति का आगाज़ था, उन हज़ारों-लाखों बेज़ुबानों की आवाज़ बनने का एक पवित्र प्रयास।

इस सभा के पीछे का दर्द और गहरा इतिहास छुपा है। उस दौर में अछूत कहे जाने वाले लोगों को गाँवों से बाहर रहना पड़ता था, कुओं से पानी नहीं पीने दिया जाता था, मंदिरों में प्रवेश वर्जित था और उन्हें शिक्षा का अधिकार भी नहीं था। उनके साथ जानवरों से भी बदतर सलूक होता था। बाबासाहेब ने अपनी आँखों से ये सब देखा था, खुद झेला था। जब वे विदेश से पढ़कर लौटे, तो उन्होंने महसूस किया कि सिर्फ किताबें पढ़ लेने से या डिग्री हासिल कर लेने से समाज की ये कड़वी सच्चाई नहीं बदलेगी। उन्होंने तय किया कि इन लोगों को उनके अधिकार दिलाने के लिए एक संगठित प्रयास की ज़रूरत है। उनके मन में यह विचार एक बीज की तरह पनपा, जिसे उन्होंने अपने संघर्षों और अनुभवों से सींचा। उन्होंने देखा कि बिखरे हुए प्रयासों से कुछ नहीं होगा, एक मज़बूत नींव चाहिए जहाँ से आवाज़ उठाई जा सके और समाज में बदलाव की बयार लाई जा सके।

बहिष्कृत हितकारिणी सभा का मुख्य उद्देश्य था 'पढ़ो, संगठित हो, संघर्ष करो' (Educate, Agitate, Organize)। इसका सीधा सा मतलब था कि सबसे पहले दलितों को शिक्षित करना है, क्योंकि शिक्षा ही हर मुक्ति का द्वार है। इसके लिए उन्होंने स्कूल खोले, छात्रावास बनाए ताकि बच्चे पढ़ सकें। 1924 में इसकी स्थापना के साथ ही, सभा ने ज़मीन पर काम करना शुरू कर दिया। उन्होंने गाँवों-गाँवों में जाकर लोगों को उनके अधिकारों के बारे में बताया, उन्हें समझाया कि वे भी इंसान हैं और उन्हें भी गरिमा के साथ जीने का पूरा हक है। 3 अप्रैल, 1927 को उन्होंने 'बहिष्कृत भारत' नामक एक पाक्षिक पत्रिका भी शुरू की, जिसके ज़रिए वे अपने विचारों और समाज की सच्चाई को लोगों तक पहुँचाते थे। ये पत्रिका सिर्फ खबरें नहीं थी, ये तो हर उस व्यक्ति की आवाज़ थी जिसे अब तक चुप कराया गया था। 1927 का महाड सत्याग्रह इसी सभा के प्रयासों का एक महत्वपूर्ण हिस्सा था, जब दलितों को सार्वजनिक तालाब से पानी पीने के अधिकार के लिए संघर्ष किया गया। ये सिर्फ पानी पीने का नहीं, आत्मसम्मान का संघर्ष था, जिसने पूरे देश में हलचल मचा दी थी।

इस सभा ने कई महत्वपूर्ण काम किए। शिक्षा के प्रचार-प्रसार से लेकर सामाजिक समानता के लिए आंदोलनों तक, बहिष्कृत हितकारिणी सभा ने दलितों के उत्थान के लिए अथक प्रयास किए। उन्होंने सरकारी नौकरियों में आरक्षण, मंदिरों में प्रवेश और अंतरजातीय विवाह जैसे मुद्दों पर भी आवाज़ उठाई। यह सभा दलितों के लिए एक आशा की किरण थी, एक ऐसा मंच जहाँ वे अपनी पीड़ा को व्यक्त कर सकते थे और अपने हक के लिए लड़ सकते थे। बाबासाहेब जानते थे कि सिर्फ आंदोलन से बात नहीं बनेगी, जब तक कि उनके लोगों को ज्ञान का प्रकाश न मिले। इसलिए, शिक्षा पर उनका विशेष ज़ोर था।

समय के साथ, परिस्थितियों में बदलाव आए और आंदोलन ने नए रूप लिए। बहिष्कृत हितकारिणी सभा ने अपना काम बखूबी किया और एक मज़बूत नींव रखी। जब 1930 में बाबासाहेब ने राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाने का फैसला किया और गोलमेज़ सम्मेलनों में हिस्सा लेने लगे, तो आंदोलन को एक नया आयाम मिला। बाद में, 1935 में, उन्होंने 'इंडिपेंडेंट लेबर पार्टी' का गठन किया, जिसका उद्देश्य दलितों और श्रमिकों के राजनीतिक अधिकारों के लिए संघर्ष करना था। इस तरह, बहिष्कृत हितकारिणी सभा का प्रत्यक्ष कार्य समाप्त हो गया, लेकिन उसके द्वारा बोए गए बीज कभी नहीं मुरझाए। उसके सिद्धांतों और आदर्शों ने आगे चलकर दलित आंदोलन को और भी सशक्त बनाया। यह सभा भले ही आज उस रूप में मौजूद न हो, लेकिन उसका प्रभाव आज भी हमारे समाज में स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। वह उन लाखों दिलों में ज़िंदा है, जिन्हें उसने उम्मीद की रौशनी दिखाई थी, उन्हें जीने की एक नई वजह दी थी। ये सिर्फ एक सभा नहीं थी, ये एक युग का परिवर्तन था।

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