भारत के संविधान में जो कुछ बातें दिल को छूती हैं, उनमें से एक सबसे बड़ी बात है अनुच्छेद 17, जो छुआछूत को जड़ से मिटाने की कसम खाता है। लेकिन इस अनुच्छेद की नींव सिर्फ कागज और क़लम से नहीं बनी, यह बनी थी उस दर्द से, जो पीढ़ियों तक कुछ लोगों को इंसान होने का हक़ भी नहीं देता था। और इस बदलाव की सबसे बड़ी मशाल जलाने वाले थे डॉ. भीमराव अंबेडकर, जिन्हें आज भी गाँव-गाँव में लोग "बाबा साहेब" कहकर आदर देते हैं।
बाबा साहेब खुद उसी पीड़ा से गुज़रे थे, जिसे वो मिटाना चाहते थे। उनका बचपन, स्कूल में किनारे बैठकर पढ़ना, पानी पीने के लिए दूसरों की मदद मांगना, और फिर भी दिल में यह ठान लेना कि “अगर समाज बदलना है, तो कानून से ही बदलेगा”—यही सोच थी अनुच्छेद 17 के पीछे। उन्होंने न सिर्फ संविधान लिखा, बल्कि समाज के सबसे दबे-कुचले लोगों की आवाज़ भी बने।
26 नवंबर 1949 को जब संविधान सभा ने संविधान को अपनाया, उसमें अनुच्छेद 17 को भी स्वीकृति दी गई। और फिर जब 26 जनवरी 1950 को संविधान लागू हुआ, तब से यह कानून देश के हर कोने में लागू हो गया। इस अनुच्छेद में साफ़ लिखा है कि "अस्पृश्यता का अंत होगा और उसका किसी भी रूप में प्रचार या अभ्यास कानूनन अपराध माना जाएगा।"
यह एक छोटा सा अनुच्छेद था, पर इसकी गूंज बहुत बड़ी थी। यह सिर्फ एक सामाजिक सुधार नहीं था, यह आत्मसम्मान की वापसी थी। इससे पहले जात-पात की बेड़ियाँ इतनी कसी थीं कि लोगों को न स्कूल में जगह मिलती थी, न मंदिर में, न कुएं से पानी भरने की इजाज़त। समाज उन्हें छूने से अपवित्र हो जाता था। बाबा साहेब ने इसे "मानवता के माथे पर कलंक" कहा था, और इसे मिटाना उनका जीवन का मक़सद बन गया।
गाँवों में, जहाँ ये छुआछूत की जड़ें सबसे गहरी थीं, वहाँ अनुच्छेद 17 एक आशा की किरण बनकर पहुँचा। अब कोई भी जात के आधार पर न दबाया जा सकता है, न अपमानित किया जा सकता है। अगर कोई ऐसा करता है, तो उसे कानून के तहत सज़ा मिल सकती है। ये सिर्फ कागज़ी कानून नहीं है, ये हर उस इंसान की लड़ाई है, जो सम्मान से जीना चाहता है।
बाबा साहेब ने कहा था कि "मैं उस धर्म को नहीं मानता जो इंसान और इंसान में भेद करे।" और इसी सोच से निकला ये अनुच्छेद, जो बताता है कि इंसानियत सबसे बड़ा धर्म है।
आज भी अगर किसी गाँव में कोई बच्चा पहली बार स्कूल में सबके साथ बैठता है, या कोई दलित बहन मंदिर में पूजा करती है, तो समझो कि अनुच्छेद 17 का असर ज़िंदा है। ये कानून हर उस आँसू की मरहम है, जो सदियों से दबा था।
लेकिन काम अभी भी बाकी है। कानून बन चुका है, पर उसे दिलों में उतरना बाकी है। और ये काम हम सबका है। जब तक समाज में बराबरी नहीं होगी, तब तक संविधान की आत्मा अधूरी है।
अगर ये लेख आपके दिल को छू गया हो, अगर आपको भी लगता है कि बाबा साहेब का सपना अब भी अधूरा है और हम सब मिलकर उसे पूरा कर सकते हैं—तो इसे लाइक करें, शेयर करें और फॉलो करना न भूलें। क्योंकि बदलाव की आवाज़ वहीं पहुँचती है, जहाँ दिल से दिल जुड़ते हैं।
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