जब भारत आज़ाद हुआ, तो देश के सामने सबसे बड़ा सवाल था – अब आगे क्या? एक ऐसा देश, जहाँ जात-पात, ऊँच-नीच, छुआछूत और गरीब-अमीर का फर्क बरसों से खून में समाया था। ऐसे समय में एक व्यक्ति खड़ा हुआ जिसने सिर्फ कानून की किताब नहीं लिखी, बल्कि एक ऐसा संविधान गढ़ा जो गरीब, दलित, और कमजोर की आवाज़ बन गया। इस महापुरुष का नाम था – डॉ. बाबासाहेब भीमराव आंबेडकर।
उन्हें सिर्फ संविधान लिखने वाला नहीं कहा जाता, बल्कि उन्हें भारत का "संविधान का पिता" कहा जाता है, क्योंकि उन्होंने वो किया जो कोई सोच भी नहीं पाया था – उन्होंने संविधान को न्याय, बराबरी और इज्ज़त का ज़रिया बना दिया।
बाबासाहेब का सपना था कि भारत का संविधान सिर्फ किताबों में बंद न हो, बल्कि आम आदमी की ज़िंदगी में बदलाव लाए। उनका मानना था कि संविधान वो हथियार है जिससे जात-पात, छुआछूत और भेदभाव की जंजीरें तोड़ी जा सकती हैं। उन्होंने कहा था:
"संविधान सिर्फ कानून की किताब नहीं है, ये समाज को इन्साफ देने वाला हथियार है।"
वो चाहते थे कि हर बच्चा, हर औरत, हर दलित, हर गरीब – सबको एक जैसे हक मिलें, चाहे वो किसी भी जाति या धर्म का हो।
बाबासाहेब ने संविधान में ऐसे कानून डाले जिनसे हर इंसान को इंसान समझा जाए। उन्होंने कहा – अगर देश में सबको बराबरी नहीं मिली, तो आज़ादी अधूरी रह जाएगी।
उन्होंने अस्पृश्यता को कानूनन अपराध बनाया, जिससे छूआछूत करने वाले को सज़ा दी जा सके। उन्होंने बोलने की आज़ादी, मंदिर में जाने का हक, स्कूल-कॉलेज में दाखिले का अधिकार, और नौकरी में बराबरी की बात की।
उनके लाए गए ये हक आज भी दलितों, महिलाओं और हर कमजोर तबके के लिए ढाल हैं।
जब लोग आरक्षण को गलत समझते हैं, तो बाबासाहेब का जवाब साफ था – ये कोई भीख नहीं है, ये सदियों से जो छीना गया, उसकी भरपाई है।
उन्होंने संविधान में प्रावधान कराया कि दलितों और आदिवासियों को शिक्षा और नौकरियों में मौका मिले, ताकि वो भी आगे बढ़ सकें। संसद और विधानसभाओं में भी उनकी आवाज़ हो, इसके लिए सीटें आरक्षित कराईं।
उनका मानना था – अगर कमजोर को बराबरी का मैदान नहीं दोगे, तो वो कैसे दौड़ेगा?
बाबासाहेब को डर था कि अगर केंद्र कमजोर हुआ तो देश बिखर सकता है। इसलिए उन्होंने संविधान में ऐसा ढांचा बनाया जिससे सरकार मजबूत हो, ताकि धर्म, जाति और इलाकों के नाम पर देश को कोई बाँट न सके।
उन्होंने IAS, IPS जैसी सेवाओं की शुरुआत कराई – ताकि हर कोने में प्रशासन मजबूत हो।
बचपन में अंबेडकर ने वो ज़ुल्म झेले थे, जो किसी बच्चे को नहीं झेलना चाहिए। पानी नहीं पीने दिया जाता था, स्कूल में नीचे बैठाया जाता था।
इसीलिए उन्होंने कहा – अस्पृश्यता सिर्फ गुनाह नहीं, बल्कि इंसानियत की तौहीन है। उन्होंने इसे अपराध बना दिया, और कानून से साफ कर दिया कि कोई किसी को "अछूत" कहेगा तो उसे सज़ा होगी।
अंबेडकर ने समान नागरिक कानून की बात की, जिससे हर महिला को शादी, तलाक, संपत्ति में बराबरी का हक मिले – चाहे वो किसी भी धर्म की हो।
उन्होंने हिंदू कोड बिल लाया था, लेकिन जब विरोध हुआ और सरकार ने उसमें कटौती की, तो बाबासाहेब ने न्याय मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया। उन्होंने कहा – "ये दलितों और महिलाओं के साथ विश्वासघात है।"
उन्होंने संविधान में इस बात की गारंटी दी कि अगर किसी के साथ नाइंसाफी हो, तो वो सीधे सुप्रीम कोर्ट जा सकता है।
अनुच्छेद 32 को उन्होंने संविधान की “आत्मा और दिल” कहा। यही अधिकार आज हजारों लोगों को जनहित याचिका (PIL) के ज़रिए इंसाफ दिलाता है।
बाबासाहेब ने साफ कहा था – भारत कोई धार्मिक राष्ट्र नहीं, बल्कि सभी धर्मों का सम्मान करने वाला देश है।
उन्होंने इस बात की गारंटी दी कि:
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हर किसी को पूजा करने का हक होगा
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लेकिन कोई धर्म, कानून से ऊपर नहीं होगा
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जाति के नाम पर भेदभाव नहीं होगा
भारत की धर्मनिरपेक्षता का मतलब है – सबको बराबर देखना, न कि अलग-अलग चश्मे से।
उन्होंने गांवों में लोकतंत्र की जड़ें बिछाईं – पंचायती राज की बात की, ताकि लोग अपने छोटे-छोटे फैसले खुद ले सकें।
लेकिन उन्होंने ये भी कहा – “गांव भारत की आत्मा नहीं हैं, वे जातिवाद के अड्डे हैं। जब तक सोच नहीं बदलेगी, गांवों में बदलाव मुश्किल है।”
बाबासाहेब के साथ सबसे बड़ा दुख ये था कि उन्होंने जो बदलाव लाने की कोशिश की, उसमें अपने ही लोग साथ नहीं दे सके।
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निवारक हिरासत जैसे कानून को लेकर आलोचना हुई
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ज़मीन सुधार पर अमीरों ने विरोध किया
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हिंदू कोड बिल को कमजोर कर दिया गया
निराश होकर उन्होंने क़ानून मंत्री पद छोड़ दिया, लेकिन लड़ाई नहीं छोड़ी।
आज चाहे जितनी भी मुश्किलें हों, भारत का संविधान अब भी गरीबों, दलितों और महिलाओं का सबसे बड़ा सहारा है।
बाबासाहेब की सोच आज भी ज़िंदा है:
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मंडल आयोग ने OBC को हक दिलाया
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SC/ST अत्याचार विरोधी कानून ने दलितों को सुरक्षा दी
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शिक्षा का अधिकार हर बच्चे को स्कूल का रास्ता दिखाता है
बाबासाहेब ने कहा था:
"अगर संविधान फेल हुआ, तो उसकी गलती नहीं होगी, गलती हमारी होगी – क्योंकि हमने उसे आत्मा से नहीं अपनाया।"
आज अगर हम सच में बदलाव चाहते हैं, तो सिर्फ संविधान पढ़ने से कुछ नहीं होगा – हमें उसे जीना होगा।